Tuesday, March 5, 2013

प्रवाह और जीवन की धारा





प्रवाह और जीवन की धारा


रोज की टेंशन और काम का बोझ लिये इंसान कब तक कमाता रहेगा। एक न एक दिन इन सबसे त्रस्त होकर उसे अपनी दिशा बदलनी ही पड़ती है कुछ ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ। जनवरी 2011 का समय था मैं सरगुजा जिले के बतौली ब्लाक के एक छोटे गांव महेशपुर में पिछले दो सालों से रह रहा था यूं तो बतौली में मेरा आना जाना सन् 2007 से है और 2008 से मैं बतौली में निवासरत था फिर महेशपुर में उसकी जोईनिंग हो गयी तो मुझे उसके साथ आना पड़ा। वैसे ये मेेरे लिए एक नया स्थान था और गांव के बारे में जानने की ईच्छा तो बचपन से ही मेरे मन मेें थी। मेरा बचपन शहर में ही बीता है और बचपन से कभी किसी गांव में नहीं गया था माता-पिता भी शहर से ही हैं और मां ईकलौती है नाना जी के गुजर जाने के बाद नानी भी हमारे साथ ही रहती है तो कभी किसी गांव की ओर जाना ही नहीं हुआ। पिताजी बहुत मेहनती हैं और उन्हीं के उपर परिवार की पूरी जिम्मेदारी है उपर से चार बच्चों को पढ़ाना-लिखाना उनके भरण पोषण की जिम्मेदारी और शिक्षित न होने के कारण मजदूरी के बल पर सब कुछ निर्वह कर पाना बहुत मुश्किल होता है। इस बीच कहीं घूमने की बात कहना तो दूर हमारे लिए सोंचना भी मुश्किल था। लेकिन वक्त और हालात इंसान से क्या नहीं करवाते, किसी की भी मानसिकता बदलने वाला सिर्फ एक ही चीज होता है और वो है वक्त। और समय की इसी धारा में मैं बहता हुआ सरगुजा आ गया। लगभग चार साल तक यहां रहते हुए बीए प्रथम और द्वितीय वर्ष की परीक्षा दी। कम्प्यूटर में एचडीसीए की डिग्री हासिल करने के बाद महेशपुर जाना हो गया तो इस फिल्ड से बाहर हो गया और वहीं गांव में एक कम्प्यूटर लेकर लोगों के मोबाईल में गाने और विडियो डाउनलोड करने का काम करने लगा। साथ ही रविवार और सोमवार को बाजार में जाकर सीडी कैसेटस और कृषि बिजों का एक छोटा सा पसरा भी लगाता था इस तरह मेरी जीविका उपार्जन के लिए थोड़े बहुत  पैसे जुटाकर आगे की पढ़ाई और बाहर रहने का खर्च वहन करने में जिंदगी व्यस्त रहती थी सोने के लिए मेरे पास दीवान तो दूर एक खाट भी नहीं थी और उसकी शिक्षाकर्मी की नौकरी के दम पर कितना कर पाती वो ? उपर से कम्प्यूटर खरीदना हमारे लिए बहुत महंगा था फिर भी कई महीनों तक अपना पेट काटकर हमने कम्प्यूटर लिया था। महेशपुर में इसका अभाव था लोगों को छोटे से छोटे कार्य के लिए 20-30 रूपये बस में फिर चाय-पानी का खर्चा और दस रूपये का काम करवाने के लिए कई किलो मीटर तक जाना होता था तो मैंने सोंचा की क्यों न यही सबको सुविधा मिल जाये फिर लोगों की जेब खर्च कम हो और मुझे भी यहीं रहकर कुछ करने का अवसर मिल सके। यही सोंचकर हमने उसे खरीदा था पर समस्या थी बिजली की सिंगल फेस कनेक्शन और वोल्टेज कम होने के कारण कंप्यूटर का चल पाना संभव नहीं हुआ तो मैने एक स्टोप्लेजर खरीदा और उसी से काम चलाने लगा। काम लोगों को पसंद आने लगा था और मैं भी खुशी से उनका काम करता था । पर यहां भी अशिक्षा के शिकार लोगों की भरमार थी वे इसे सिर्फ एक टीवी के रूप में ही जानते थे और टीवी गांव में कम होने व ब्लेकएण्ड वाईट टीवी से बोर हो चुके गांव के लोग मेरे पास आ जाते थे। फिर क्या है उन्हे टीवी दिखाएं या कुछ काम करें?
ले देकर बाजार ही ठीक लगने लगा पर दो दिन का बाजार, महीने का हिसाब करे तो सिर्फ आठ दिन और खर्च के लिए पूरे तीस दिन।
आप लोग जो बाहर का जीवन जी रहे हैं या फिर रह चुके हैं, जानते ही होंगे की बाहर रहे इंसान तो उसे हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है चाहे वो पानी ही क्यों न हो। इस तरह से बाहर का जीवन मेरा दुखद ही रहा मै उसे कभी कोई खुशी भी नहीं दे पाता था वो अगर मुझे बिना बताये कुछ अपने लिए या मेरे लिए ले आती तो मुझे जबरन गुस्सा दिखाकर उसे लौटाने को कह देता था ये मेरी मजबूरी थी मैं तो बस यही चाहता था की कुछ पैसे हाथ में रहे। हम अभी बाहर हैं अगर किसी को कुछ हो जाता है तो हमारा यहां तो कोई है नहीं किससे मदद की गुहार करेंगें। हाथ पैर भी सही सलामत है तो किसी से कुछ मांगना भी अपने मुह पर तमाचे के सामान लगता है। 
यही सोंच कर मैंने उसे वहीं रहने को कहा और मैं स्वयं रायगढ़ आकर कुछ काम की तलाश करने लगा। इसी बीच मेरी मुलाकात मेरे एक मित्र मनोज से हो गई जो काफी समय से प्रेस लाईन से जुड़ा हुआ था और केलो प्रवाह में ऑपरेटर का काम करता था मैंने उसे अपनी समस्या के कुछ चंद बिन्दुओं को बताया तो उसने मुझे काम दिलाने की उम्मीद जताई। चार-पांच दिन तो मुझे काम में लगते ही रह गये। फिर जब काम पर गया तो सब कुछ नया सा था मेरे लिए कभी इस लाइन में रहा नहीं था तो क्या करना है क्या नहीं कुछ समझ ही नहीं आता था और पूछुं भी तो किससे? 
मेरी टाईपिंग में स्पीड भी कम थी और कृतिदेव से सीधे चाणक्य में काम करना वो भी 4सी लिपिका के साथ, क्वार्क एक्सप्रेस सोफ्टवेयर में कुछ समझ ही नहीं आता था मेरे बगल की सीट में एक और भाई साहब बैठते थे गोस्वामी जी, वो भी मेरी ही तरह थे पर मुझसे कुछ बेहतर। नाम था विजय गोस्वामी उनहे इन सब के बारे में मुझसे ज्यादा जानकारी थी और सीधे सरल व्यवहारवादी होने के कारण उनसे कुछ भी पुछना मेरे लिए सहज हो जाता था एक सप्ताह हो गये थे मुझे यहां काम कतरे और काम के ठीक आठवें दिन का मेरा जाना था तभी महेशपुर से उनका फोन आया और उन्होंने मुझसे कुछ अजीबो गरीब बात की जिसे मैं समझ भी नहीं सका। मुझे रायगढ़ आये पन्द्रह दिन ही हुए हैं और इतनी जल्दी धाराओं का अलग दिशा में बहना मेरा दिमाग फिर सा गया। आधे रास्ते में होने के कारण मैंने बात रोक कर रख ली और अपने काम पर चला गया लेकिन काम में मन भी नहीं लगा। और किसी तरह काम खतम होने के बाद जब घर आया तो रात के 2 बजे होंगें नींद भी नहीं आई। बैठा सोंचता रहा, क्या हुआ होगा, ऐसा क्यों हो रहा है, ये सही है यो गलत ? 
जैसे ही सुबह के चार बजे मैं रायगढ़ के बस स्टैण्ड जा पहुंचा 4:30 में एक गाड़ी थी और सफर 6 घंटे का था। किसी को खबर भी नहीं कर सका कारण था किसी का संपर्क नंबर का न होना। पर हालात ही ऐसे थे कि वहां ना जाता तो किसी की जान भी जा सकती थी और शायद वो मैं भी हो सकता था। महेशपुर पहुंचा तो हुआ भी कुछ ऐसा ही और मुझे शांतिपारा जो बतौली से महज दो किलोमीटर की दूरी पर है वहां अस्पताल में भर्ती कराना पड़ गया तीन दिन लगे मुझे शारीरिक रूप से ठीक होने में और मानसिक रूप से आज तक नहीं हो सका हुं। 
वहां आठ दिन रहने के बाद वापस आया तो मेरे सीट पर कोई और बैठे मिले मुझे। मैं समझ गया कि मेरी गलती थी तो इसकी सजा मिल रही है मैंने उस व्यक्ति से पूछा कि क्या आप यहां काम करने आये हैं तो उसका जवाब था हाँ। 
मैंने और कुछ भी नहीं कहा और इस तरह से मेरा नाता केलो प्रावह से छूट गया। दो तीन महीने तक तो अपनी मानसिक स्थिती को सुधारने में जुटा रहा की काश किसी तरह उन बातों को भूला सकुं, लेकिन कुछ भी नहीं हो सका
फिर खाली दिमाग शैतान का घर न बन जाये इसलिए काम की तलाश करने लगा उसी समय इस्पाट टाइम्स प्रेस के सभी कर्मचारी दैनिक भास्कर में चले गये थे और इस्पात सिर्फ एक खाली खोखा बनकर रह गया था मुझे उसकी जानकारी मिली। जानकारी पाते ही मैं वहां पहुंच गया और मासिक 6 हजार रूपये वेतन की दर पर अपनी सेवाएं देने लगा, पर वहां अग्रवाल जी का कटाक्ष पूर्ण व्यवहार और कड़क बोली किसी को भी नहीं भाती थी इस कारण हर कोई उनसे दूर रहना चाहता था पर रहे दूर तो कैसे आखिर पूरे अखबार का जिम्मा उनपर है और हर किसी की गतिविधियों पर उनकी नजर का होना भी जरूरी था। पर बातें उनकी कभी किसी को सुकुन नहीं दे सकीं और सितम्बर 2011 में सबने एकबार फिर उन्हें अलविदा कर दिया। कोई राजस्थान पत्रिका में चला गया तो कोई कहीं और मैं और संतोष भैया जो बिहार के रहने वाले थे दोनो ने क्रांतिकारी संकेत को चुन लिया और यहीं काम करने लगे । यहां इस्पात के ठीक विपरीत कार्य होता था मालिक सिर्फ एक बार ऑफिस आते और सारे काम का बोझ हम पर ही थमा कर चले जाते उनका प्रेस की लाईन में नया कदम था इससे पहले उन्होंने कभी प्रेस का काम नहीं देखा था और हमारे भरोसे ही टिके थे कभी कोई विज्ञापन प्रकाशित करना होता था तो वो हमसे पूछते थे कि क्या कीमत होनी चाहीए इस विज्ञापन की?
लगभग यहां हम लोगों ने दस महीने तक काम किया और फिर एक बार मेरी पूरी टीम ने काम छोंड़ दिया मै सबसे सीनियर था तो काम का बोझ मेरे सिर पर आ गया और दो ऑपरेटर के भरोसे पूरे प्रेस को चला पाना मुश्किल हो गया। मैने सर से इस बारे में बात की तो उन्होंने दो गोबर गनेश मेरे ऑपरेटर मेरे हिस्से में थमा दिया और कहने लगे की इन्हे सीखाओ तो तुम्हे काम में आसानी हो जायेगी। अब समस्या और बढ़ गई मैं अपना काम समय से पूरा करूं  या फिर इन्हें सिखाऊं । मैंने अपना हिम्मत खो दिया और यहां से मुक्ति द्वार अपना लिया । मुझे लगने लगा कि इस्पता ही ठीक था इसकी अपेक्षा और इसी बीच मेरी मुलाकात अविनाश पाठक से हो गई वो मुझे इसी विषय पर बात करने लगे की ऑफिस में कम लोग हैं तो आप आना चाहो तो हमारे यहां वापस आ जाओ। मैंने भी सोंचा की यही सही होगा और मैं वापस आ गया लेकिन अग्रवाल जी को देख फिर उसी पल को पाना मेरे लिए सहीं नहीं लगा  3 माह काम करने के बाद मैनें वहां से रेजाइन दे दिया।
इस्पात टाइम्स को अलविदा कहे मुझे 2 माह हो गये थे, और मेरे पास करने को कोई काम न था ।

(शेष अगले अंक में )
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लेखक- बजरंग यादव
बेलादुला खर्राघाट, रायगढ़ (छ.ग.)


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